वेद पढ़ो या शास्त्र हर ज्ञान व्यर्थ है अगर आप किसी का प्रेम नहीं पढ़ सकते
हम ज्यादातर किसी के भी प्रेम को नहीं समझ पाते
ऐसे वक्त पर जब वो ख़याल करता है या करती है
और आप उसे हलके में लेने लगते है, और वो उससे दूर जाने के कई बहाने ढूढने लगते है, वजह एक आज कल के रिश्तों को किस्तों में चलाना है, चाहे वो पारिवारिक रिश्ते हो या किसी भी तरिके का मित्रता हो, या उसका खुद का प्यार ही क्यों न हों, एक रिश्ता विश्वास से बनता है और वो विश्वास आपस में एक दूसरे को समय देकर,एक दूसरे को समझते है फिर उस रिश्ते में गुड़ की तरहा मीठा स्वाद जीभ को लगती है।
अच्छा कभी कभी हम चंद लोगों से मिलकर, या कभी बुरे वक्त से गुजर जाने के बाद हम रिश्तों के फ़िलोसफर बन जाते है और बेचारा कोई तीसरा,कोई नए रिश्ते की शुरुवात करने जा ही रहा होता है वो उसके परम ज्ञान को सुनकर चला तो जाता है उससे नए रिश्ता बनाने के लिए लेकिन वो तीसरा इंसान अपने दिमाग़ पर बैठाया हुआ होता है और जब कभी कोई घटना भविष्य में होता है तो उस परम ज्ञान से मिलता जुलता तब असली नाटक शुरू हों चूका होता है, "देखा मेरा दोस्त तो सही कहता था और देखो वही हुआ" अब इस चकर में इतने सारे गलतफैमीया गलतफैमीयां पैदा हों चुकी होतीं है की लगभग संभालना मुश्किल हों चूका होता है और ठीक कुछ सालों के बाद,अब वो फ़िलोसफर बन चूका होता है ठीक उसी तरहा और लोगों को अपना परम ज्ञान दें रहा होता है जैसे वो देरहा था और ये सिलसिला चलता ही रहता है इसलिए.................
"वेद पढ़ो या शास्त्र हर ज्ञान व्यर्थ है अगर आप किसी का प्रेम नहीं पढ़ सकते"
💖💖👌👌
ReplyDeleteशुक्रिया ❤
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