वव्यहार

एक अच्छा व्यव्हार कमाना एक अच्छे धन अर्जित करने से कई ज्यादा है, लेकिन इस बात को समझने में लोग सदियाँ लगा देते है।
 उदहारण के तौर पर,  एक जूते सिलने वाले मौची से भी वैसा ही व्यवहार रखो जैसा की किसी अभिनेता,विधायक या मंत्री से रखते हो, ऐसा मेरा मानना है। अब नेताओं से व्यव्हार इसलिए रखते है कि दब-दबा बना रहें और काम के वक्त काम आए अमूमन ऐसे कम ही देखने को मिलता है।  और व्यव्हार ऐसा भी नही होना चाहिए कि "इससे मित्रता हो तो हमारे काम ही आएगा" हालांकि अब व्यव्हार भी धन और पद देख कर ही लोग रखते है।  देखा जाए तो व्यव्हार कि भी नीलामी होती है और नीलामी भी उसी आधार पर जहाँ आपके जेब में नोटों कि गर्मी हो उस पर भी प्लस जीएसटी। अब आपके ऊपर है चाहे तो गूगलपे करें या पेटीएम या कैश दें बात घुमा फिरा कर वही होगी। जाना एक ही के जेब में है जिसको आप अपना व्यव्हार नीलाम कर रहें है। बदले में वो आपको कुछ फायदा देगा।  जरिया कई हो सकते है देने के, लेकिन ठिकाना तो एक है जहाँ आप अपना व्यव्हार बेच कर आरहे है।
आने वाला भविष्य व्यवसाय है उसके बाद राजनीती और फिर मिडिया और फिर कहीं बाद में व्यव्हार, उसमे भी व्यव्हार दो तरीके के, एक जो आपका बढ़िया पद देख कर आपके आगे पीछे घूमे, दूसरा जो इमनादारी के साथ आप जैसे भी हो वैसा ही स्वीकार करे और आपका सम्मान करे।
एक सच्चाई यह भी है कि जब तक आपके पास पैसा है लोग पुछेंगे,  भाई तु कैसा है? जहाँ आप थोड़े से डगमगा गए वहाँ सब आपसे दर किनारा करेंगे चाहे आपका खुद का औलाद ही क्यों ना हो।

पीयूष-

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