चाँद और मेरे ख़याल
रात के 2 बज रहें और मै अपने घर के छत पर बैठा चाँद को निहार रहा था। चाँद ठीक मेरे दखिन कि और मै चाँद के ठीक उत्तर कि तरफ। आसमान बिल्कुल साफ, बिल्कुल कोरा काला। उसकी तेज इतनी कि मै रात में भी अपनी परछाई देख सकूँ। इतनी तेज उस चाँद कि, जिसे मै निहार रहा था पिछले आधे घंटे से और ऊपर से मदमस्त हवा बेह रही की सारी थकावट मानो दूर, बस इस माहौल में सराबोर हो चले थे हम और बस चाँद को निहारना अच्छा लग रहा था, अचानक बड़ी तेज़ी से एक चमकती रौशनी चाँद के सामने से गुजरी और मेरा सारा ध्यान चाँद से हट कर उस तेज भागती रौशनी पर गया। कुछ दूर तक अपना सफर तय कि और फिर ओझल हो चली मानो किसी टोनी स्टार्क ने अपने रोबोटिक सूट प्रशिक्षण के दौरान हो और गायब हो गया हो।
खैर जब आसमान कि तरफ देखते है बिल्कुल शान्ति मन से जब शोर अज्ञातवास में चला जाता है और चारों और अंधेरा ही अंधेरा हो, छत्त पर एक दरी बिछा कर उस पर लेट जाना और दोनों हाथों को सर के पीछे लगा देना मानो अब हाथ ही तकिया बन चूका है।
ऊपर आसमान को ताकते रहो, चाँद को निहारते रहो और मन में पुरानी-पुरानी यादें ताज़ होतीं रहें, कई किस्से, कहानियों के दृश्य एक साथ आँखों के सामने चलने लगती हों मानो कोई मूवी देख रहें हो बिल्कुल खो से जाते है।
अब उस टूटते तारे को ही ले लीजिए, लेटने के दौरान एक बार मन में ख़याल आता जरूर होगा की कोई इच्छा मांग ही लें भले ही कुछ देर के लिए बच्चकानी लगे तो लगे, यूँ टूटते तारे से अपनी इच्छा मांगना इसकी भी अपनी ही मौज है और हम मन ही मन मांग ही लेते है।
और कुछ देर के लिए ही सही हम अपने बचपन की और आगे बढ़ ही जाते है।
और फिर से चाँद को निहारने लगते और फिर से खो जाते।
पीयूष-
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