वक्त वक्त कि बात है

वक्त, वक्त का खेल है।
वक्त कि एक सबसे बुरी आदत है वो कभी भी बदल जाती है।  वो यह नही देखती कि कौन, कब, किस हैसियत में है या था उसका स्वाभाव ही परिवर्तन है।
आज जिनके भी सितारे गर्दिश में है किसी भी कारण से वो हर वक्त नही रहेगा, उसे कभी ना कभी तो टूट कर या तो हवा में मिल जाना है या फिर ज़मीन पर बिखर जाना है।
ये नियम है पुरी कड़वी है पर है और पूर्णसत्य भी यही है।
"समय हर किसी का आता है कभी न कभी,
ज़रूरत हर किसी को पड़ती है कभी न कभी।
ये वक्त कि दौलत आज उसकी तो कल किसी और कि होगी
समय है आज मेरी तो कल किसी और कि होगी".....
मेरी इन लाइनों में एक आईना है जिसे आप अपने आपको देख सकते है।
एक कहावत है-
जिसने भी दिया एक कतरा भी साथ हमारा,
 वक्त आने पर  पूरा समुन्दर लुटाएंगे।

पीयूष-

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